भगवान शिव के आस्तित्व को नासा भी अब नहीं नकार पा रहा है : The Lord Shiva

By | March 30, 2020
        

        भगवान शिव करोड़ों लोगों की धार्मिक आस्था का केंद्र तो है ही विज्ञान जगत में भी इनकी अहमियत है विज्ञान भी कई बार यह मानता है कि भगवान है जब बात भगवान शिव की आती है तब। अब तो अमेरिकी वैज्ञानिक अंतरिक्ष एजेंसी नासा भी मौजूदगी से मना नहीं कर सकती कई बार नासा के हावर टेलीस्कोप से ली गई तस्वीर मे भगवान शिव के दिखाई देने के दावे भी किए हैं वहीं स्विट्जरलैंड में मौजूद दुनिया की सबसे बड़ी प्रयोगशाला के बाहर भगवान शिव के नटराज अवतार की मूर्ति लगी हुई है हालांकि इसके पीछे वैज्ञानिकों ने कोई दावा नहीं किया है लेकिन विज्ञान को भगवान शिव से जोड़कर देखा जाता रहा है| ऑस्ट्रेलियाई मूल के भौतिक अमेरिकन वैज्ञानिक और दार्शनिक शेब्रा ने शिवजी के स्वरूप नटराज को तांडव नृत्य में परमाणु की उत्पत्ति और विनाश से जोड़ा है शे ब्रा ने 1972 में प्रकाशित किताब MAIN CURRENCE OF MODERN THOUGHT में THE DANCE OF SHIVA में शिव के नृत्य और परमाणु के बीच समानता की चर्चा की थी इसके बाद 8 जून 2004 को जेनेवा स्थित CERN यूरोपियन रिसर्च ऑफ फिजिक्स में तांडव नृत्य करती नटराज की 2.25 मीटर की ऊंची प्रतिमा का अनावरण किया गया था इस मूर्ति को भारत के साथ CERN के सहयोग के लिए जश्न मनाने के लिए दिया गया था CERN के वैज्ञानिकों का मानना है कि वह जो प्रयोग कर रहे हैं वह भगवान शिव के संघार करने के सिद्धांत पर आधारित है यानी पहले संघार करो फिर निर्माण करो इसलिए CERN प्रयोगशाला के बाहर भगवान शिव की तांडव करती हुई नटराज मूर्ति लगी हुई है नासा के प्रयोग का नाम भी भगवान शिव के नाम पर रखा गया है नासा के इस प्रोजेक्ट का नाम है THE SHIVA (SPACE FILET HOLOGRAPHY IN A VEARCHUAL APERTURES) यह पर्यावरण और अंतरिक्ष में मौजूद बेहद सूक्ष्म कणों के गुरूत्वाकर्षण शक्ति अध्ययन के लिए बनाया गया था
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 शिव के तांडव पर क्या है वैज्ञानिक थ्योरी 

शिवजी के नृत्य के दो रूप हैं एक है लाह शिव इसे नृत्य का कोमल रूप कहा जाता है दूसरा है तांडव जो विनाश को दर्शाता है भगवान शिव के नृत्य की अवस्थाएं सृजन और विनाश दोनों को समझाती हैं शिव का तांडव नित्य ब्रह्मांड में हो रहे उतार चढ़ाव के क्रियाओं का प्रतीक है इसी पर बड़ी वैज्ञानिक थ्योरी सामने आई है CERN लेबोरेटरी के बाहर भगवान शिव के नटराज की प्रतिमा पर शैब्रा ने बताया वैज्ञानिक उन्नत तकनीकों का इस्तेमाल करते हुए कॉस्मिक डांस का प्रारूप तैयार कर रहे हैं कॉस्मिक डांस यानी भगवान शिव का तांडव नृत्य जो विनाश और सृजन दोनों का प्रतीक है तांडव करते हुए भगवान शिव नटराज के पीछे बना हुआ चक्र ब्रह्मांड को दर्शाता है उनके दाएं हाथ का डमरू नए परमाणु की उत्पत्ति और बाएं हाथ में अग्नि पुराने परमाणुओं के विनाश का संकेत देती है इसे समझा जा सकता है कि अभय मुद्रा में भगवान का दूसरा दाया हाथ हमारी सुरक्षा जबकि वरद मुद्रा में उनका उठा दूसरा बाया हाथ हमारी जरूरतों की पूर्ति सुनिश्चित करता है

 शिव की पूजा पर वैज्ञानिक थ्योरी

उज्जैन के धर्म विज्ञान और शोध संस्थानों के वैज्ञानिकों ने शिवलिंग पर चढ़ाए जाने वाले पूजन सामग्री पर शोध किया है शोध में दावा किया गया है कि न्यूक्लियर रिएक्टर और शिवलिंग में समानता होती है ज्योतिर्लिंग से ज्यादा मात्रा में ऊर्जा निकलती है उस ऊर्जा को नियंत्रित करने के लिए शिवलिंग पर लगातार जल चढ़ाया जाता है संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉक्टर जगदीश चंद्र जोशी के मुताबिक न्यूक्लियर में आंख के पदार्थ कार्डियक लाइको साइड, फैटी एसिड व टॉक्सिन पाए जाते हैं इससे पैदा होने वाली गर्मी को संतुलित करने के लिए शिव पूजा में मदार के फूल और बेलपत्र चढ़ाए जाते हैं जो कि न्यूक्लियर ऊर्जा को संतुलित रखते हैं शोध संस्थान धन विज्ञान के वैज्ञानिक वैभव जोशी के अनुसार दूध में फैट प्रोटीन लैक्टिक एसिड दही में विटामिन कैल्शियम फास्फोरस और शहद में फ्रकतोस्तर ग्लूकोस्टर डाई सैक्रैज और ट्राई सैक्राई एंजाइम होते हैं इसीलिए दूध दही और शहद शिवलिंग पर कवच बनाए रखते हैं इसके साथ ही शिव मंत्रों से निकलने वाली ध्वनि सकारात्मक ऊर्जा को ब्रह्मांड में बढ़ाने का काम करती है धर्म और विज्ञान पर अध्ययन करने वाली संस्था ने शिवलिंग पर चढ़ाए जाने वाली चीजों की प्रकृति और उन में पाए जाने वाले तत्वों के वैज्ञानिक व्याख्या के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला है

 बिल्वपत्र पर सामने आई हिट थ्योरी 

बिल्वपत्र से गर्मी नियंत्रित होती है उसमें टेनिस पोटेशियम मैग्नीशियम जैसे रसायन होते हैं इससे बिल्वपत्र की तासीर बहुत शीतल होती है तपिश से बचने के लिए इसका उपयोग बहुत फायदेमंद होता है विल्वपत्रों का औषधीय उपयोग करने से आंखों की रोशनी बढ़ती है और पेट के कीड़े खत्म होते हैं और शरीर की गर्मी भी नियंत्रित होती है।

 शिव के रुद्राक्ष का वैज्ञानिक रहस्य 

शिवपुराण के विदेश्वर संहिता के अनुसार रुद्राक्ष की उत्पत्ति शिवजी के आंसुओं से हुई है वही वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अनुसार रुद्राक्ष में पाए जाने वाले गुण मनुष्य के नर्वस सिस्टम को दुरुस्त रखते हैं रुद्राक्ष में कोमोफॉमोकोलॉजिकाल नाम का गुण पाया जाता है इस गुण से ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित करने में सहायता मिलती है इससे दिल की बीमारियों का खतरा कम रहता है रुद्राक्ष में आयरन एलमुनियम कैल्शियम सोडियम और पोटेशियम के गुण पर्याप्त मात्रा में होते हैं।

 नासा का क्या है शिव विज्ञान 

अमेरिकी अंतरिक्ष विज्ञान एजेंसी नासा ने कई रिसर्च किए हैं बहुत सी विस्तृत में शिव के प्रजेंट की चर्चा आई है हालांकि इस मामले में कोई ऑफिशियल स्टेटमेंट सामने नहीं आई है लेकिन विज्ञान के बीच में चर्चा आम रहती है दरअसल नासा के न्यू क्लियर SPECTROSCOPIC TELESCOPE यानी न्यू स्टार ने 2014 मैं एक नेवियुला की तस्वीर ली जिसका नाम रखा गया है द स्क्वायर भगवान के हाथ की तरह दिखता यह नेबुला अंतरिक्ष से 17000 प्रकाश वर्ष की दूरी पर है विज्ञान की भाषा में इसे पल्सर नेवेउला विंटेज कहते हैं लेकिन लोगों ने इसे भगवान शिव का हाथ माना था इसी तरह 2017 में नासा के हावर टेलिस्कोप को बादलों में अलग-अलग प्रकार के बादलों का समूह दिखाई दिया जोकि त्रिशूल की तरह दिख रहा था जिसे भगवान शिव का त्रिशूल बताकर सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया गया था नासा ने एक स्टडी में बताया कि पृथ्वी पर पहला डीएनए एक शिवलिंग के साथ आया था यह शिवलिंग पृथ्वी पर एक उल्कापिंड के साथ आया था यह शायद अलास्का में गिरा था ऐसे कयास लगाए जा रहे हैं दोस्तों की कहानी किस तरह से नासा और शिव के बीच का गहरा रहस्य आज भी बना हुआ है।
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